Wednesday, March 23, 2016

कलयुग की बात करते हैं....

जन्म देने वाली माँ को दुत्कार कर संस्कारों की बात करते हैं,
बीच बाज़ार नग़्न खडे जो, वो इज्जतदारों की बात करते हैं।
शीशे के घरों में रहने वाले दीवारों की बात करते हैं,
दो क़दम ना चल पाए वो संग और परिवारों की बात करते हैं।।

अपने सुख में भी जो संतुष्ट नहीं वो दुखियारों की बात करते हैं,
उजालों से ना कभी बाहर आए जो, वो अंधकारों की बात करते हैं ।
सदा अकेले रहने वाले हज़ारों की बात करते हैं,
ख़ुद के लालच की सीमा नहीं और पुण्यकारों की बात करते हैं।।

तिजोरी को ताला लगाकर वो क़र्ज़दारों की बात करते हैं,
अपने अहं में माग़रूर वो ज़िम्मेदारों की बात करते हैं।
शराब के नशे में डूबे हुए, होशियरों की बात करते हैं,
शमशान में जले मुर्दे, पहरेदारों की बात करते हैं।।

वर्णमाला सीखी नहीं, साहित्यकारों की बात करते हैं,
कफ़न ओढ कर लेटे हैं और जानदारों की बात करते हैं।
कुओं के मेंढक, सारे संसारों की बात करते हैं,
पतझड़ में गिरे हुए पत्ते, बहारों की बात करते हैं।।

बैठें हैं झोली फैलाकर और देनदारों की बात करते हैं,
अग़ल बग़ल की ख़बर नहीं और समाचारों की बात करते हैं।
अपनी दहलीज कभी लांघी नहीं पर दरबारों की बात करते हैं,
खुदख़ुशी करके वो हत्यारों की बात करते हैं।।

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